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रंगमंच यह सारी दुनिया

रंगमंच यह सारी दुनिया

रंगमंच यह सारी दुनिया भांति भांति के किरदार।
कभी सभा सजती भव्य लगता रहता है दरबार।
कोई मंत्री कोई नायक लश्कर लारे लारे चलता।
कोई गुरु कोई चेला दांव पेच मन ही मन पलता।


दृश्य मनोहर नैन लुभाते कब वक्त बीतता जाये।
कब अभिनय पूरा हो जाए कब पर्दा गिर जाये।
कभी करुणा रुला देती कभी क्रोध का पारावार।
कभी खुशी में नर झूमता कभी दुखों की भरमार।


सुख दुख धूप छांव भांति बहती भावन रसधार।
अपने-अपने रोल निभाते मंच माहिर कलाकार।
कोई हंसता कोई गाये साज सुरीले कोई सुनाये।
कोई आकर चला जाता है दर्द भरी यादें दे जाये।


दुनिया के रंगमंच पर है सूरज चांद सितारे सारे।
सागर नदिया हसीं वादियां महकती मस्त बहारें।
साधु लोभी भोगी रोगी योगी संत सयाने जग में।
दो दिन का मेला है किसके कहां ठिकाने पल में।


रमाकांत सोनी सुदर्शन


नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान

रचना स्वरचित व मौलिक है


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