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सत्संग ही एकमात्र साधन है जिससे लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है :-- स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज

सत्संग ही एकमात्र साधन है जिससे लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है :-- स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज

सत्संग ही एकमात्र साधन है जिससे लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है ।सत्संग से मनुष्य को आंतरिक और बाह्य दोनों तरह की विसंगतियों से मुक्ति मिलती है और वह परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करता है ।" उक्त उद्‌गार स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज जी ने माँ तारा नगरी केसपा में आयोजित लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के समापन समारोह में व्यक्त किए।
आज स्वामी जी ने एक कथा के माध्यम से सत्संग के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यिपु पिछले जन्म में भगवान के द्वारपाल थे ।उनका नाम जय और विजय था। संतों के श्राप के कारण उन्हें असुर योनि में जन्म लेना पड़ा। इसलिए कभी भी संतों का अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है।हिरण्याक्ष को जब भगवान द्वारा संहार कर दिया तब हिरण्यकश्यिपु का क्रोध भड़क उठा। उसने भगवान से बदला लेने के लिए घोर तपस्या कर कुछ ऐसा वरदान प्राप्त किया जिससे उसे लगा कि अब उसे कोई नहीं मार सकता, परन्तु भगवान के आगे कोई तरकीब काम नहीं करता और आगे ऐसा ही हुआ। भगवान ने नरसिंह रुप धारण कर उसके सारे वरदानों को ध्वस्त करते हुए जांघ पर बैठा कर उसे नख से ही फाड़ डाला। धन्य है पुत्र प्रह्लाद जो अपने पिता के द्वारा तरह - तरह की प्रताड़ना से प्रताड़ित होने पर भी भगवान से यही प्रार्थना किया कि मेरे पिता नरकगामी न हो। पुत्र का अर्थ ही होता है जो अपने पिता को नरक जाने से बचा दे। असुर कुल में जन्म लेकर भी प्रह्लाद ने जो अपने पिता के लिए किया वह अच्छे कुल में जन्म लेकर आज के पुत्र करने को तैयार नहीं।इसका एक ही कारण है कि प्रह्लाद ने माता के गर्भ में ही नारद जी के द्वारा दिए गए सत्संग को ग्रहण किया था।परन्तु आज लोग सत्संग से दूर रहते हैं जिसके कारण माता-पिता को वृद्धावस्था में वृद्धाश्रम में जाना पड़ता है।अत: सत्संग ही एक साधन है जिससे लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है सत्संग से आत्मशुद्धि होती है और मनुष्य को ईश्वर का सानिध्य प्राप्त होता है।
श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के अंतिम दिन भक्तों की अपार भीड़ रही। प्रातः काल से ही माँ तारा के प्रांगण में दर्शन के लिए लंबी-लंबी कतारें लग गई। दर्शन के उपरांत भक्तगण द्वारा हवन किया गया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज से दीक्षांत ग्रहण किया। लोगों ने जीवन में धर्म के मार्ग पर चलने और सत्संग को आत्मसात करने का संकल्प लिया। इस महायज्ञ में आए तभी आगंतुकों के लिए भंडारा का आयोजन किया गया जिसका प्रबंध सेवानिवृत प्राचार्य एवं यज्ञ समिति के अध्यक्ष कामता शर्मा द्वारा किया जा रहा है। इस यज्ञ को सफल बनाने के लिए आयोजन समिति के अध्यक्ष कामता शर्मा, कोषाध्यक्ष राजीव शर्मा, हिमांशु शेखर, अमिताभ कुमार, प्रमोद कुमार, मुन्ना शर्मा, विक्रम कुमार,गौरव कुमार रणविजय शर्मा सहित कई ग्रामीण तन मन धन से समर्पित होकर कार्य कर रहे हैं।
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