गउरइया
मार्कण्डेय शारदेय
गउरइया कहीं भा गौरैया; छोटी-चुकी चिरईं हर आँगन, छत, छान्ही प फुदुकत लउकी।बाकिर; लोगन के बीचे रहेवाली ई पखेरू ना जाने अब काहें कम लउकेले।एकरा फुदुकला से घर-आँगन कतना सोभनउक लागत रहे! ई आदमी के अतना निकट रहत रहे जे एकर खोंता केहू के घरे में रहे।मतलब; केहू से कवनो भय ओकरा ना रहल।तबे त एगो कहाउत बा जे सहकल गउरइया भँड़सारी में लगवलस खोंता।मानतानी जे भँड़सार में ओकरा खोंता ना लगावेके चाहीं। काहें कि ओमें पतई लहकाइके बालू गरम कके भुजुना भुजाई त खोंता, अंडा, बच्चा आ अपनहू जरिके राखे नू हो जाई!
खोंता लगवले रहे भा ना, पता ना।बाकिर; अइसन बुझाता जे अन्योक्ति में कवनो जवान के दियाइल सीख ह।जवानी के जोश में ऊ अनेति करत होई।अनेति ना त मूर्खतो मान सकींला। काहेंकि; अगर गउरइया भँड़सार में खोंता लगाई त खोंता त जरबे करी अपनहूँ ना बाची। ओसही नासमझी में जोश में होश गँवाके केहू उलुटा-पुलुटा काम करी त बर्बादे नू होई!
खैर; हमनी के विषय बा गउरइया के विश्लेषण।ओकर रूप-रंग, आकार-प्रकार आ स्वभाव जानल-सुनल।एसे एकर समानार्थी शब्दन प ध्यान दिहल।त; संस्कृत कोशन में एकरा के चटक, कलविंक, चित्रपृष्ठ, गृहनीड, वृषायण, काभुक, नीलकंठ, कालकंठक आ कामाचारी कहल गइल बा।कहल गइल बा त असही ना नू कहल गइल होई! कहेवाला सोचि-बिचारिये के नू नाम देले होई! केहू के केहू मूरुख भा पागले कहेला त ओकरा ओह आदिमी में कवनो माने में ऊ ओइसन बुझाला तबे त कहेला! एसे ई मानेके परी जे कवनो नाम के कारण कवनो लक्षण अवश्य देखल-बिचारल गइल होई।
अब आईं; पहिले चटके प चिन्तन-मनन कइल जाउ।एह नाम-निरुक्ति प विचार कइल जाउ त लागता जे कवनो पारखी देखले होखसु जे ई धान भा चाउर आदि के छोट-छोट दाना के अपना चोंच में लेके चट से फोरिके खा जाले।एही से एकर निरुक्ति में कहल गइल बा—‘चटति भिन्त्ति धान्यादिकं चंचुपुटेन इति’।
चटक पुंलिंग ह आ एकर स्त्रीलिंग चटका ह।हिन्दियो में गौरा पुंलिंग आ गौरैया स्त्रीलिंग मानल गइल बा।बाकिर; हिन्दी होखे भा भोजपुरी गौरैया, गउरइये के प्रचलन बा, जे स्त्रीलिंगे ह।वास्तव में हिगरावल कठिन बा।एही से गउरइये चलेला।हँ; अमरसिंह त ओकर पुंलिग स्त्रीलिंग सन्तानो के नाम बतावताड़ें।उनुका अनुसार चाटकैर एकर नर बच्चा ह।बाकिर; मादा बच्चा खातिर शब्द बतावे में चुपा जाताड़ें आ चटका ही कहि देताड़ें।उनुकरो का गलती! ऊ त शब्दसंग्रही हवें।उनुका समय तक चटक, चटका आ चाटकैर शब्दे प्रचलन में आइल होइहें।
खैर; एह गउरइया के लेके एगो सुन्दर कथा ‘देवीभागवत’ (1.4) में आइल बिया।कहनी के मोताबिक एकबार महर्षि व्यास देखलें जे नर आ मादा गउरइया अपना लगले के जामल बच्चा के छोड़िके उड़ि गइलें।अबही बचवा के पाँखियो ना आइल रहे।ऊ दूनो कहीं से दाना लियइलें आ ओकरा मुँह में डालि देलें।फिर; सस्नेह ओकरा के चूमे-चाटे लगलें।व्यासजी के ई देखिके सन्तान के भइला के सुख समझ में आइल।ऊ बिचारे लगलें जे जब एह छोट-छोट चिरईं के अतना सन्तान-प्रेम बा त मनुष्य-दम्पती के कतना होई! इनिकर ई बच्चा बुढ़ापा के सहारा होई कि ना, बाकिर मनुष्य त आपन बुढ़ापा के सहारा के साथे-साथे अन्त्येष्टि तक के असरा लगवले बड़ प्रेम-दुलार से बच्चा जनमावेला आ पाले-पोसेला।
ज्ञान खाली किताबे आ गुरुए किहाँ ना रहे।ऊ त कूड़ा-करकट आ जंगल-मसानो में जामेला। बलुक; जेने देखीं, ओने; जेमें देखीं, ओमें लउकेला; सहजे मिलि जाला।महर्षि के ज्ञान एह गउरइया के जोड़ी से खुलल।तब जाके बाँड़ रहेके प्रण कइले व्यासजी के सन्तान के महत्त्व समझ में आइल।एकरा बादे शुकदेवजी के जनम भइल।
*** अब कलविंक नाम प आइल जाउ।त; ई नाम जे रखल, ऊ देखल जे ई चिरईं कल, अर्थात् मधुर स्वर में विंक, माने बोलेवाली बिया।एही से ई नाम देलस आ एही से एकर निरुक्ति में कहाइल- ‘कलं मधुरास्फुटं वङ्कते रौति इति’।वास्तव में वंक शब्द ‘वकि गतौ’ धातु में ‘अच्’ (अ) प्रत्यय लगला से बनल बा।गति के अर्थ गइल होला।बाकिर; सामान्य गमन खातिर ई ना आवे।ई टेढ़ चलला खातिर आवेला।एही से बाँका आ बाँकपन बनल बा।एकर मतलब जे गउरइया के गति में बाँकपन होला।अब प्रश्न बा जे गत्यर्थक वंक बा त निरुक्ति में ‘रौति’ काहें कहल गइल! रौति त ‘रु—शब्दे’ धातु के क्रियापद ह, जेकर अर्थ भइल—बोलता भा बोलतिया।बुला; एकर बोलियो में मधुरता के साथे बाँकपन होला, एसे कहाइल।चित्रपृष्ठ के मतलब भइल—जेकर पीठ चितकाबर होखे आ गृहनीड के अर्थ भइल जे घरे में जेकर खोंता होखे।वृषायण बुला एसे कहाइल जे ई बैलो प बइठ जाले आ ऊ चलेला तबो ना उड़ें।बइठिके सवारी के मजा लेले।कामुक, कामाचारी काहें कहाइल, पता ना।बुला; स्वेच्छा से जहाँ मन होखे, ओहिजा जाले-आवेले एसे।
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