आज की सच्चाई
कहते हैं, साहित्य समाज का आईना है।
एक साहित्यकार वही लिखता है,
जो समाज में रोज हो रहा है।
यदि समाज का रूप बदरूप है,
तो आईना रूपी साहित्य वही दिखाएगा।
अच्छा, बुरा सब दिखेगा, जो भी है जैसा।
अपने बदरूप पर अब घबराना कैसा।
घर परिवार हो या समाज हो।
राजनीति हो या जनता का मिज़ाज हो।
सब जगह तो भ्रष्टाचार फैला हुआ है।
उपर से साफ दिखता है,
पर अंदर अंदर सब कुछ मैला है।
कोई सुधार करने को तैयार नहीं है।
हर चीज व्यापार बना हुआ है।
घाटा सहने को कोई तैयार नहीं है।
साहित्यकार अच्छा श्रृजन करने में थकता नहीं है।
पर उसके अनुरूप बदलाव होना चाहिए।
आज जो समाज और परिवार बंट रहा है।
उसे रोकने के लिए आलोचकों को आगे आना चाहिए।
सुधार असंभव नहीं होता,
अंत:करण साफ होना चाहिए।
हम तो लेखन के माध्यम से आग्रह कर सकते हैं।
बाकी औरों को सही दिशा में आगे आना चाहिए।
जय प्रकाश कुंवर
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