सनातन
सनातन वह है , जो आस्था और विश्वास के रंगों में सना तन , शीश पर सत्कर्म रखे हुए तथा कंधे पर प्रारब्ध लिए हुए आदिकाल से ही अपने कर्म मार्ग पर निरंतर अग्रसर हो ।
अर्थात सृष्टि के आदिकाल में में अनेक ऋषि महर्षि मुनि तपस्वी हुए हैं और हमारी कतार निरंतर बढ़ती रही । इन्हीं कतार से निकलकर इसी मानवीय धर्म की जागृति के लिए महापुरुष उपदेश देते रहे और हम सबने उनके उपदेशों का अनुसरण किया , किंतु उन महापुरूषों के मृत्योपरांत अपनी सुविधा के अनुरूप उनके सुंदर व सुखद उपदेशों को तोड़ मरोड़कर पुस्तक तैयार किया और उनके नाम पर एक अलग धर्म बना डाला ।
इसी प्रकार लोग कतार से निकलते गए और अनेक धर्म तैयार होते गए , किंतु शेष जो समस्त धर्मों का समुचित आदर करते हुए अपने कर्म मार्ग पर अग्रसर होते रहे , वे सनातन कहलाए ।
इतना ही नहीं, यही हिंदुस्तान के वासी होने के कारण तथा इसका संस्कृति संस्कृत और मातृभाषा हिन्दी होने के कारण यही हिन्दू कहलाए । यही कारण रहा है कि एक से बढ़कर एक महान योद्धा , ऋषि , मुनि , ज्ञानी , योगी , तपस्वी , साधु , संत , महात्माओं का जन्म तथा देव देवियों का अवतरण सदैव हिन्दुस्तान में ही होता आया है ।
वैसे भी हमारी यह सृष्टि मनु और शतरूपा से ही आरंभ हुआ है
जय श्रीराम ।
मौलिक एवं अप्रकाशित
अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा
छपरा ( सारण )बिहार ।
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