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ओटा पर कोठी के धान सूख रहलो हे।

ओटा पर कोठी के धान सूख रहलो हे। 

डॉ रामकृष्ण मिश्र
ओटा पर कोठी के धान सूख रहलो हे। 
 बिन पानी अँतरा के पान सूख रहलो हे।। 
बरसे  के धूम धाम बादर  ‌ बरसलन। 
बीचे  छनक गेल  नीन भूख   रहलो हे।। 
कागज पर छपा गेलो   बिन बजले ढोल। 
खाली हहारो मेंं  कुकुर भूँक रहलो हे‌।। 
एक‌  दने   सस्ताएल  नफरत     ईमान। 
 भाँडे़ में खर- पत सन नेह झोंक रहलो हे।। 
अपने मे़ं कहा  -सुनी होय कपर फोरी। 
घरवे   हुँडा़र- बाज ताल ठोक रहल़ो हे।। 
टोला के का कहबंऽ   अँगने   हहासल। 
अपने  पोसपुतवा  किरपान भोंक रहलो हे।। 

रामकृष्ण

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