एक तराशा मां ने हीरा,
बोल उठी - बलिदानी की,एक समाधि बोल उठी।
बड़े प्रेम से बलिदानी की,
सारी बातें - बोल उठी ।।
एक तराशा मां ने हीरा,
किया देश को अर्पित।
आओ बैठो, बातें कर लो ,
कर लो पुष्प समर्पित ।।
वरमाला नहीं पड़ी गले में ,
पड़ी थी रस्सी फांसी की ।
चूमा बड़े प्रेम से उसको,
जब शत्रु ने फांसी दी ।।
अर्पित सर्वस्व किया देश को,
चाह की थाली खाली थी।
रहे सुरक्षित देश सदा ही,
बस यही कामना पाली थी।।
बलिदानों की धरती है ये,
स्थल है बलिदानी का ।
समाधि नहीं राष्ट्र चेतना,
नाम उचित वरदानी का।।
जाग उठो - अब सीना तानो ,
माता तुम्हें पुकार रही ।
शत्रु सम्मुख खड़ा आपके ,
भारत मां ललकार रही।।
सोच वही है, वेश वही है,
कुछ चेहरे बदले दिखते हैं।
रुप नया है दानवता का ,
सब पहचाने से लगते हैं।।
नीति वही - रणनीति वही,
हथियार वही हैं हाथों में।
घात लगाकर करते हमला,
करते सारा काम इशारों में।।
छलिया, छद्मी, पाखंडी सब,
आज भी उनके साथ खड़े।
इतिहास पुराना दोहराने को,
सभी विधर्मी साथ खड़े।।
गिद्धों की भांति रहे उतरते,
पुरा काल में दानव।
रीति वही आज भी जारी,
बढ़ते जा रहे देश में दानव।।
डॉ राकेश कुमार आर्य
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