जब जब हुए धर्म विमुख,बाधाएं खड़ी हुईं सम्मुख
अधुना भौतिक चकाचौंध युग,जीवन दशा दिशा चिंतनीय ।
सर्वत्र प्रगति दंभ गुणगान,
पर मानवता उत्थान दयनीय ।
तज निज संस्कृति संस्कार ,
गमन पाश्चात्य भोग विलास सुख ।
जब जब हुए धर्म विमुख,बाधाएं खड़ी हुईं सम्मुख ।।
प्रकृति परे जीवन शैली,
मोबाइल अंतर मस्त मगन ।
परिवेश प्रति चेतना शून्य,
अपनत्व हीन संबंध सदन ।
परंपरा मर्यादा मूल विलोप,
वासना तृप्ति कृत्य प्रमुख ।
जब जब हुए धर्म विमुख,बाधाएं खड़ी हुईं सम्मुख ।।
जर्जर परिवार समाज ढांचा,
परस्पर मेल मिलाप धूमिल ।
दया करुणा प्रेम सहयोग न्यून,
जीवन पर्याय यांत्रिक प्रमिल ।
धन संपदा पद मनुज मापदंड,
सत्य न्याय संग अथाह कष्ट दुःख ।
जब जब हुए धर्म विमुख,बाधाएं खड़ी हुईं सम्मुख ।।
हर दृष्टि अंतर वासना निर्झर,
स्पर्श संसर्ग कुत्सित प्रयास ।
हर वय नारी गात केंद्र बिंदु ,
कृत्रिम समता समानता उजास ।
करबद्ध निवेदन सभ्य नागरिकगण,
समग्र प्रयास नैतिकता उन्मुख ।
जब जब हुए धर्म विमुख,बाधाएं खड़ी हुईं सम्मुख ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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