परमात्मा: बाह्य नहीं, आंतरिक अनुभूति
मनुष्य सदियों से परमात्मा की खोज में है। कभी वह उसे किताबों के पन्नों में ढूँढता है, तो कभी मंदिरों की मूर्तियों में। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी वह कभी-कभी ईश्वर के रूप में देखने लगता है। लेकिन क्या वास्तव में परमात्मा वहाँ मिलता है? नहीं। परमात्मा कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुभूति है।
उक्त पंक्तियाँ हमें इस सत्य का बोध कराती हैं कि परमात्मा केवल पुस्तकों में सीमित शब्द नहीं है, जिसे पढ़कर समझा जा सके। वह कोई मूर्ति भी नहीं, जिसे पूजने मात्र से प्राप्त किया जा सके। न ही वह किसी विशेष व्यक्ति में समाहित है, जिसे समाज में खोजा जाए। बल्कि परमात्मा जीवन है, जो हर जीव के भीतर स्थित है।
जब हम बाह्य संसार की चकाचौंध से हटकर अपने भीतर झांकते हैं, जब हम अपने विचारों को शुद्ध करते हैं और प्रेम, करुणा, और सेवा का मार्ग अपनाते हैं, तब हमें परमात्मा की वास्तविक अनुभूति होती है। यह अनुभूति न केवल हमारे जीवन को सार्थक बनाती है, बल्कि हमें सच्चे आनंद और शांति की ओर ले जाती है।
इसलिए, यदि परमात्मा की खोज करनी है, तो बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरना होगा। अपने अंतर्मन को शुद्ध कर, सत्य, प्रेम और सेवा के मार्ग पर चलकर ही हम उस परम चेतना से साक्षात्कार कर सकते हैं, जिसे हम 'परमात्मा' कहते हैं।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा
(कमल सनातनी)
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