हो रहल उठापटक|
डॉ रामकृष्ण मिश्रहे हो रहल उठापटक बिचार के अखनी।
ई कउन राग में हे सुर उतार के अखनी।।
हम्मर जने -जने नजर गेलो त देखली।।
बन सोझ टेंढ़ घूमित हुँङा़र के अखनी।।
अप्पन हे कउन आन ई कहना बड़ी कठिन
झलकित ठहर के देखलऽ डिरार के अखनी।।
अदमी के आदमी कहे मे़ंं लाज जो लगे।
सबतरहे परेसानअउ बीमार हे अखनी ।।
जोरियाके खान-पान रखाएल जने - तने।
भूखल पिआसले टगित अलचार हे अखनी।।
पत्थर तरे जताल हाथ ऱोइओ न सके।
सुग्गा निअन रटबा रहल संसार के अखनी।।
रामकृष्ण
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