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मैं मरुथल-सा चिर प्यासा, तू प्रेम सुधा की अविरल धारा----

मैं मरुथल-सा चिर प्यासा, तू प्रेम सुधा की अविरल धारा----

साहित्य सम्मेलन में विदुषी कवयित्री डा ललितांशुमयी की जयंती पर आयोजित हुआ कवि-सम्मेलन

पटना, २ अप्रैल। "मैं मरुथल-सा चिर प्यासा, तू प्रेम सुधा की अविरल धारा/ मैं स्वाति का एक बूँद तू प्रेम सुधा की अविरल धारा--", "क्योंकि तुम्हारे आने से हवा में घुल जाती है मिठास।", आदि काव्य-पंक्तियों से बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन संध्या तक सुरभित होता रहा। अवसर था कवि-सम्मेलन का, जो विदुषी कवयित्री डा ललितांशुमयी की जयंती पर आयोजित किया गया था। 

कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह ने अपना गीत पढ़ते हुए कहा कि “सोंचता हूँ कि काश तुम आ जाती हमारे  जीवन में/ क्योंकि तुम्हारे आने से हवा में घुल जाती है मिठास/ फ़िज़ा में तैर जाती है अपनेपन का अहसास/ तुम्हारे आने से अनगिनत छेद वाले चादर से झांकता आसमां मखमली ओढ़ना-बिछौना बन जाता है” । युवा कवयित्री दिव्या राज चौहान ने ऋंगार की इन पंक्तियों से "प्रेम अदृश्य है/ निराकार है/ सदियों से कहता ये संसार है/ मैं कहती हूँ देखा हैं मैंने प्रेम को निज दृगों से/ सर्व सुंदर ये साकार है" , श्रोताओं का दिल जीत लिया। 

वरिष्ठ शायरा डा शमा नासमीन 'नाजां' ने कहा- "करो यह वादा मेरी ग़ज़ल-ख़्वां जो मैं कहूँगी, वह तुम करोगे/ सजाओगे बज़्म यारा जो मैं कहूँगी, वह तुम करोगे/ हमेशा सुनती रही तुम्हारी, कभी तो आए मेरी बारी/ यही है सदियों से दिल का अरमां, जो मैं कहूँगी वह करोगे”। युवा कवयित्री प्रेरणा प्रिया का कहना था- “मसला स्त्री और पुरुष का कहाँ था कभी/ मसला तो है सही और ग़लत का/ स्त्री जननी है तो पुरुष भी जनक है/ एक घर में दोनों की अपनी-अपनी महक है।"

वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, डा मधु वर्मा, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, डा सुधा सिन्हा, डा वंदना मिश्र, सदानन्द प्रसाद, ईं अशोक कुमार, जय प्रकाश पुजारी, डा अनिल कुमार शर्मा, चितरंजन भारती, नरेंद्र कुमार, नीता सहाय, प्रेरणा प्रिया, शंकर शरण आर्य, नमिता लोहानी, विनोद कुमार झा आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी अपनी रचनाओं से खूब तालियाँ बटोरी। 

अपने अध्यक्षीय उद्गार में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने जयन्ती पर विदुषी कवयित्री ललितांशुमयी को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें हिन्दी की साधवी कवयित्री बताया। डा सुलभ ने कहा कि ललितांशु जी अपने विद्वान पिता आचार्य धर्मेंद्र ब्रह्मचारी से साहित्य का संस्कार प्राप्त किया था। पिछली पीढ़ी में बिहार की जिन थोड़ी सी महिलाओं ने साहित्य की सेवा का व्रत लिया उनमे ललितांशु जी का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उन्होंने स्त्री-विमर्श को ही नहीं लेखन में महिलाओं की भागीदारी की भी प्रेरणा दी। वे सही अर्थों में एक साधवी साहित्यकार थीं। 

डा सुलभ ने श्रोताओं के आग्रह पर अपना गीत "मैं मरुथल-सा चिर प्यासा, तू प्रेम सुधा की अविरल धारा"  का सस्वर पाठ किया, जिसका श्रोताओं ने करतल-ध्वनि से स्वागत किया। 
सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, ललितांशुमयी के छोटे पुत्र कप्तान अभिनव गुप्त तथा उनके छोटे भाई धर्मेंद्र कुमार ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रो सुशील कुमार झा ने किया।

समारोह में, वयंग्यकार बाँके बिहारी साव, कमल नयन श्रीवास्तव, प्रवीर कुमार पंकज, प्रीति सिन्हा, प्रभा रानी, डा प्रेम प्रकाश, सच्चिदानंद शर्मा, डा चंद्रशेखर आज़ाद, संजय कुमार, अश्विनी कुमार, मुस्कान कुमारी समेत अनेक सुधीजन उपस्थित थे ।

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