साहित्य सम्मेलन में बलिदानी कवि पं माखन लाल चतुर्वेदी की मनायी गयी जयंती, दी गयी काव्यांजलि
पटना, ४ अप्रैल। "चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ!--- मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक!, मातृ-भूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !", ऐसी गहरी राष्ट्रीय-संवेदना की अमर रचना करने वाले महान कवि, स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार पं माखनलाल चतुर्वेदी एक ऐसे राष्ट्र-भक्त थे, जो जीवन-पर्यन्त राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा के लिए संघर्ष रत रहे। स्वतंत्रता-संग्राम में जेल की यातनाएँ भी भोगी और हिन्दी के प्रश्न पर भारत सरकार को 'पद्म-भूषण सम्मान' भी वापस कर दिया। वे एक बलिदानी राष्ट्र-प्रेमी थे। उनके विपुल साहित्य के मूल में, प्रेम और उत्सर्ग की भावना है। उनमें राष्ट्र-प्रेम है, प्रकृति-प्रेम है और वह शाश्वत प्रेम भी है, जिसे मनुष्य का पाँचवाँ पुरुषार्थ कहा जाता है। उनकी विश्रुत रचना 'पुष्प की अभिलाषा' देश के लिए मर मिटनेवाले लाखों वीर सपूतों की अशेष प्रेरणा है।
यह बातें शुक्रवार को साहित्य सम्मेलन में कवि की १३७वीं जयंती पर आयोजित समारोह व कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन-अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, चतुर्वेदी जी अद्भूत प्रतिभा के कवि, पत्रकार, लेखक और आचार्य थे। १६ वर्ष की आयु में ही एक विद्यालय में शिक्षक हो गए थे। उनकी प्रथम काव्य-पुस्तक, 'हिम किरीटिनी' के लिए, १९४३ में, उन्हें तबके श्रेष्ठतम साहित्यिक सम्मान, 'देव-पुरस्कार' से अलंकृत किया गया था। उनकी पुस्तक 'हिमतरंगिनी' के लिए १९५५ में उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ, जो हिन्दी के लिए अकादमी की ओर से दिया गया प्रथम पुरस्कार था। भारत सरकार ने १९६३ में उन्हें 'पद्मभूषण' अलंकरण से विभूषित किया था,किंतु 'हिन्दी' को 'राष्ट्रभाषा' न बनाए जाने के विरोध में उन्होंने यह अलंकरण लौटा दिया।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि आरपी घायल ने जब यह पढ़ा कि “क्या हुआ जो अंधेरा हुआ तो हुआ/ मुझसे रौशन हुई, रौशनी भी यहाँ", तो तालियों की गड़गड़ाहट से सम्मेलन की दीवारें भी गूँज उठी। डा शंकर प्रसाद ने अपनी ग़ज़ल को स्वर देते हुए कहा- "तेरा अज़ाब बहुत देर तक नहीं रहता/ तेरा दर्दे-ख़्याल बहुत देर तक नहीं रहता”। डा रत्नेश्वर सिंह का कहना था- “मेरे पास आओ दुखों के जो मारे/ मैं लगा दूँगा तेरा जीवन किनारे/ सुख दुःख की क्या बात करती हो तुम/ तुम हो तो दुःख भी हमारे, हैं प्यारे।"
कवि सुनील कुमार ने अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा- “जो लबों तक आके रुक जाए, वो नग़मे क्या कहें/ अब कोई पूछे न हमसे, दर्द के सरगम गए"। मशहूर शायरा शमा कौसर 'शमा' ने इन पंक्तियों से ईद मुबारक कहा कि "बाजुओं को फैला के कहो, ईद मुबारक/ आओ न क़रीब ! आके कहो ईद मुबारक/ हर दिल में तुम्हें प्यार की शमा है जलानी/ हर शख़्स को जाके कहो, ईद मुबारक!”
अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में डा अनिल सुलभ ने प्रेम और विरह के इस गीत को सस्वर पढ़ा कि "हृदय को कर लिया पावन, पधारो मेरी राधा जी/ हुआ जाता है कान्हा-मन, पधारो मेरी राधा जी!”
वरिष्ठ कवि आचार्य विजय गुंजन, प्रो सूर्य प्रकाश उपाध्याय, जय प्रकाश पुजारी, ओम् प्रकाश पाण्डेय 'बदनाम', कुमार अनुपम, मधुरानी लाल, डा शालिनी पाण्डेय, डा रमाकान्त पाण्डेय, डा सुषमा कुमारी, पं गणेश झा, सदानन्द प्रसाद, निभा चौधरी, विनोद कुमार झा, नीता सहाय, डा अनिल कुमार शर्मा, दिव्या राज चौहान, सुनीता रंजन, प्रेरणा प्रिया, अरविन्द कुमार वर्मा आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी अपनी रचनाओं से वातावरण में रस की वर्षा की। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
वरिष्ठ व्यंग्यकार बाँके बिहारी साव, रंगकर्मी अभय सिन्हा, डा विजय कुमार शर्मा, डा चन्द्र शेखर आज़ाद, अजीत कुमार भारती, कौशल कुमार चौधरी, दुःख दमन सिंह, प्रेम अग्रवाल आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
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