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मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का अवतरण दिन - श्रीरामनवमी

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का अवतरण दिन - श्रीरामनवमी


‘चैत्र शुक्ल नवमी को ‘श्रीरामनवमी’ कहते हैं । श्रीराम के जन्म के उपलक्ष्य में श्रीरामनवमी मनाई जाती है । इस दिन जब पुष्य नक्षत्रपर, मध्यान्हके समय, कर्क लग्न में सूर्यादि पांच ग्रह थे, तब अयोध्या में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ । अनेक राममंदिरों में चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक यह उत्सव मनाया जाता है । रामायण के पारायण, कथा-कीर्तन तथा श्रीराम की मूर्ति का विविध शृंगार कर, यह उत्सव मनाया जाता है । नवमी के दिन दोपहर में श्रीराम जन्म का कीर्तन किया जाता है ।
इस दिन श्रीराम का व्रत भी रखा जाता है । ऐसा कहा गया है कि यह व्रत करने से सभी व्रतों का फल प्राप्त होता है तथा सर्व पापों का क्षालन होकर अंत में उत्तम लोक की प्राप्ति होती है ।

रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती है - भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया । परंतु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा में रहने वाले लक्ष्मण कैसे राम जी से दूर हो जाते ! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की….. परंतु पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढते हुए दुविधा में थे । सोच रहे थे कि मां ने तो आज्ञा दे दी, परंतु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा ! क्या कहूंगा !
यहीं सोच-विचार करते हुए जब अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला आरती का थाल लेकर खडी थीं । वे बोलीं, “आप मेरी चिंता छोड, प्रभु की सेवा में वन जाइये । मैं आपको नहीं रोकूंगी । मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आए, इसलिए साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी ।”
लक्ष्मणजी को कहने में संकोच हो रहा था । परंतु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला ने उन्हें संकोच से मुक्त कर दिया । वास्तव में यही पत्नी-धर्म है । पति संकोच में पडे, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से निकाल दे !
लक्ष्मण जी चले गये परंतु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया । वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं, परंतु उर्मिला ने भी अपने महल के द्वार कभी बंद नहीं किए और सारी रात जाग-जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया ।
मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने पर जब हनुमान जी उनके लिये संजीवनी बूटी सहित द्रोण गिरी पर्वत लेकर लौट रहे थे, तब मार्ग में अयोध्या पड़ा और नंदीग्राम में भरत ने उन्हें राक्षस समझकर उनपर बाण चला दिया । हनुमान जी गिर जाते हैं । तब हनुमान संपूर्ण वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया और लक्ष्मण मूर्छित हैं ।
यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर नहीं रखना । माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं । अभी शत्रुघ्न है । मैं उसे भेज दूंगी । मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिए ही तो जन्मे हैं । माताओं का प्रेम देखकर हनुमान की आखों से अश्रुधारा बह रही थी । उन्होंने उर्मिला की ओर देखा, तो सोचने लगे कि यह इतनी शांत और प्रसन्न कैसे हैं ? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?
हनुमान पूछते हैं – देवी ! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है ? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जाएगा। इस पर उर्मिला का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किए बिना नहीं रह पाएगा। वे बोलीं -“मेरा दीपक संकट में नहीं है, वह बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिए, कारण आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो, योगेश्‍वर राम की गोद में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता।  वे दोनों केवल लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वनवास गए, तब से सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं, और जब भगवान् की गोद मिल गई है तो थोड़ा अधिक विश्राम हो गया। वे उठ जाएंगे। शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं है। शक्ति तो रामजी को लगी है। मेरे पति की हर श्‍वास में राम हैं, हर धडकन में राम, उनके रोम-रोम में राम हैं, उनके लहु की बूंद-बूंद में राम और जब उनके शरीर और आत्मा में केवल राम ही हैं, तो शक्ति रामजी को ही लगी, वेदना रामजी को हो रही है। इसलिए हे हनुमान, आप निश्‍चिंत होकर जाएं । सूर्य उदित नहीं होगा।”
रामराज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं… कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान राम ने तो केवल रामराज्य का कलश स्थापित किया, परंतु वास्तव में रामराज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया।

अखंड भारत की स्थापना - भगवान श्रीराम ने ही सर्वप्रथम भारत की सभी जातियों को एक सूत्र में बांधने का कार्य अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान किया और अखंड भारत की स्थापना की थी। भारतीय राज्य तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र इत्यादि सहित नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी श्रीराम पूजनीय माने जाते हैं। परंतु अंग्रेज के शासनकाल में ईसाइयों ने धर्म परिवर्तन का कुचक्र चलाया और श्रीराम को वनवासियों से अलग करने के पूरे प्रयत्न किए, जो आज भी जारी है ।

इस परम पावन दिन का अधिकाधिक लाभ हम कैसे लें ?
देवताओं एवं अवतारों की जन्मतिथि पर उनका तत्त्व भूतल पर अधिक मात्रा में सक्रिय रहता है।श्रीरामनवमी के दिन रामतत्त्व सदा की तुलना में १ सहस्र गुना सक्रिय रहता है । इसका लाभ लेने हेतु रामनवमी के दिन ‘श्रीराम जय राम जय जय राम ।’ यह नामजप अधिकाधिक करें। रामायण में ‘राम से बडा राम का नाम’ की कथा भी हम सबने सुनी है। सभी जानते हैं कि ‘श्रीराम’ शब्द लिखे पत्थर भी समुद्र पर तैर गए। उसीप्रकार श्रीराम का नामजप करने से हमारा जीवन भी इस भवसागर से निश्‍चित मुक्त होगा।
परन्तु अभी के काल में बढ़ते अनाचार एवं विभिन्न माध्यम से हो रहे देवताओं का अनादर को देखते हुए, हम प्रभु श्रीराम का श्रद्धापूर्वक नामजप और भक्ति किस प्रकार करें ?
इसीलिये सभी श्रीरामभक्त इस विषय में जागरूक होकर धर्महानि रोकने का प्रयास करें! धर्महानि रोकना काल के अनुसार आवश्यक धर्मपालन है। इसके बिना देवता की उपासना परिपूर्ण नहीं हो सकती।श्रीराम के एक हाथ में धनुषबाण है तथा एक हाथ आशीर्वाद देनेवाला है। हम सदैव प्रार्थना करेंगे "हे धर्मपालक श्रीराम, मुझसे सदैव धर्माचरण करवा लीजिए तथा समाज में विभिन्न प्रकार से हो रहे धर्महानि को रोकने हेतु हमसे उचित कृति करवा लीजिये"।
इसके साथ ही हम सभी रामनवमी पर भगवान श्री राम से प्रेरणा लेकर, पूर्ण समर्पित होकर रामराज्य की स्थापना के लिए प्रयास कर पाएं, यही श्रीराम जी के चरणों में प्रार्थना करें।

सन्दर्भ : सनातन संस्था के विभिन्न जालस्थल

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